Edited By :- Shashi Kumar, Prime Time News Desk.
Pakur :- पाकुड़ जिले के कई प्रमुख सरकारी विभागों में इन दिनों एक अजीब घालमेल देखने को मिल रहा है। दफ्तरों में संविदा या आउटसोर्सिंग के नाम पर 10,000 से 12,000 रुपये के मामूली मासिक मानदेय पर रखे गए गैर-सरकारी कंप्यूटर ऑपरेटरों की ठाट-बाट और कमाई किसी प्रथम श्रेणी के सरकारी अधिकारी को भी मात दे रही है। सूत्रों की मानें तो बिना किसी प्रशासनिक शक्ति के, ये ऑपरेटर हर विभाग में समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं।
सरकारी सिस्टम पर हावी ‘प्राइवेट’ ऑपरेटर.
जाति-आवासीय प्रमाण पत्र, म्यूटेशन, ठेकेदारी बिलों के भुगतान से लेकर विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की फाइलें आगे बढ़ाने तक—हर मेज पर इन ऑपरेटरों का कब्जा है। काम कराने आने वाले आम नागरिकों और ग्रामीणों से सीधे पैसों की मांग की जाती है। यदि कोई व्यक्ति बिना रिश्वत दिए नियमानुसार काम कराने का आग्रह करता है, तो उसे नियमों का उलझाव बताकर लटका दिया जाता है या फिर कानूनी कार्रवाई और मुकदमों की धमकी दी जाती है।
धमकी देने का अधिकार आखिर किस कानून ने दिया?
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि एक निजी एजेंसी के जरिए रखे गए कंप्यूटर ऑपरेटर को किसी नागरिक को डराने या कानूनी धमकी देने का अधिकार किस कानून के तहत मिला है? भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में केवल अधिकृत सरकारी अधिकारी ही विभागीय या कानूनी नोटिस जारी कर सकते हैं। लेकिन पाकुड़ के कई विभागों में स्थिति यह है कि मुख्य अधिकारी मूकदर्शक बने रहते हैं और सारा ‘लेन-देन’ और धौंस यही ऑपरेटर जमाते हैं।
अधिकारियों की सरपरस्ती या लाचार सिस्टम?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह पूरी अवैध वसूली बिना अधिकारियों की शह के संभव नहीं है। अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए अपनी विभागीय आईडी और पासवर्ड तक इन ऑपरेटरों को सौंप देते हैं। इसी छूट का फायदा उठाकर ये कर्मचारी कटमनी का बड़ा जाल फैला चुके हैं, जिसका एक हिस्सा कथित तौर पर ऊपर तक जाता है।
सरकारी दफ्तरों में चल रहे इस खेल पर अगर जिला प्रशासन ने जल्द नकेल नहीं कसी, तो आम जनता का सरकारी तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। जरूरत इस बात की है कि इन ऑपरेटरों की संपत्ति और उनकी गतिविधियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
Repoted By :- Saroj Kumar Jha, Prime Time News, Pakur.











