झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) और स्वयं सहायता समूहों की पहल ने दुमका जिले की दो महिलाओं—मेरिला किस्कू और नंदिता देवी—की जिंदगी में ऐसा बदलाव लाया है, जो आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गया है। मिनी ट्रैक्टर के माध्यम से इन दोनों महिलाओं ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता का रास्ता खोल दिया।
सीमित आय से सशक्तिकरण तक की यात्रा।
Dumka – मसलिया प्रखंड के दातियापुर गांव की मेरिला किस्कू वर्ष 2017 में “दुलाड़ रसिया” स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। उस समय उनका परिवार पारंपरिक खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर था। सालाना आय लगभग ₹60,000 से ₹70,000 के बीच थी, जिससे घर का खर्च चलाना ही बड़ी चुनौती था।
समूह से जुड़ने के बाद उन्हें नियमित बचत, बैंकिंग व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की जानकारी मिली। JSLPS और भूमि संरक्षण विभाग के सहयोग से समूह के माध्यम से उन्हें मिनी ट्रैक्टर प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने खेतों में समय पर जुताई शुरू की और धान व सब्जियों की उन्नत खेती अपनाई। साथ ही गांव के अन्य किसानों के खेतों की जुताई कर किराया आय अर्जित करने लगीं।
आज उनकी वार्षिक आय बढ़कर लगभग ₹1,50,000 से ₹1,80,000 तक पहुंच गई है। बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत और आवश्यक संसाधनों की खरीद अब संभव हो पाई है। मेरिला किस्कू आज गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।
दुमका सदर प्रखंड के गांदो गांव की नंदिता देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे 5 जून 2018 को “सरस्वती आजीविका स्वयं सहायता समूह” से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बचत और ऋण सुविधाओं की जानकारी मिली। अब तक वे ₹2,97,000 का ऋण प्राप्त कर चुकी हैं, जिसमें से ₹1,83,000 की राशि चुका भी चुकी हैं।
वर्ष 2023 में उन्हें मिनी ट्रैक्टर मिला, जिसने उनकी खेती को नई दिशा दी। वर्तमान में वे अपनी 2 बीघा जमीन पर आलू, मटर, टमाटर और धान की खेती कर रही हैं। लगभग ₹25,000 की लागत से वे बेहतर उत्पादन और अच्छा लाभ अर्जित कर रही हैं। साथ ही वे गांव की अन्य महिलाओं के खेतों की जुताई कर अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर रही हैं।
महिलाओं के लिए प्रेरणा
मेरिला किस्कू और नंदिता देवी की सफलता यह साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही मार्गदर्शन, संसाधन और तकनीकी सहयोग मिले, तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकती हैं, बल्कि समाज में नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकती हैं। स्वयं सहायता समूह और कृषि यंत्रीकरण का यह संगम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है।
आज इन दोनों महिलाओं की पहचान केवल किसान के रूप में नहीं, बल्कि बदलाव की अगुवाई करने वाली सशक्त महिलाओं के रूप में हो रही है। मिनी ट्रैक्टर उनके लिए सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक बन चुका है।
Editor By -Shashi Kumar (PTN NEWS DESK)











